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लावारिस नही मुसलमान मौलाना के खुतबे के बाद रुका भारत में - हयात ज़फर हाशमी 
February 22, 2020 • Faisal Hayat • Social



कानपुर । एमएमए जौहर फैंस एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हयात ज़फर हाशमी की अगुवाई में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व आजाद भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की पुण्यतिथि पर आयोजित जलसे मे खिराज ए अकिदत पेश करते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष हयात ज़फर हाशमी ने केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के बयान पर हमला करते हुए कहा कि भारत का मुसलमान को लावारिस नही है जब जिसका मन चाहे कहकर चला जाता है कि पाकिस्तान चले जाओ।हाशमी ने कहा कि मौलाना आजाद ने 1947 में जब दिल्ली की जामा मस्जिद पर खड़े हो कर अपने सम्बोधन (खुतबे) मे भारत के मुसलमानों से रुकने की अपील की थी तो उस वक्त गांधी और नेहरू सहित सबकी सहमति से उक्त बयान दिया था।
और उसके बाद ही मुसलामान भारत में रुका था। पाकिस्तान भेजने की बात करने वालों पर मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
हाशमी ने आगे कहा कि मौलाना आजाद देश के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सिपाहियों में से एक थे। आमतौर पर वह मौलाना आजाद के नाम से जाने जाते थे। आजाद कई भाषाओं में निपुण थे उनमें हिन्दी , इग्लिश , अरबिक , उर्दु , बंगाली और पर्शियन प्रमुख थी।
मरणोपरांत 1992 में कलाम को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह कलाम साहब के देश के प्रति उनके योगदान को देखते हुए दिया गया। कहा जाता है ।
हाशमी ने मौलाना की जिन्दगी पर रोशनी डालते हुए कहा कि मौलाना  आजाद 
मौलाना आजाद भारत लौटने के बाद सबसे पहले आजाद ने  महज् दो वर्ष के अन्तराल में मौलाना ने उत्तर भारत और बम्बई में क्रान्ति के केन्द्र बना दिए।1912 में मौलाना ने मुसलमानों में देशभक्ति जगाने के लिए एक उर्दु पत्रिका प्रारम्भ की। इस पत्रिका का नाम ‘अलहिलाल’ था।
अलहिलाल पत्रिका मुख्य रुप से हिन्दु मुस्लिम एकता और मुसलमानों में देशभक्ति जगाने के लिए प्रारम्भ की गई थी। लेकिन दो वर्ष में ही यह पत्रिका विचारों को हवा देने में क्रान्तिकारी की प्रमुख पत्रिका बन गई। इस पत्रिका में प्रमुख रुप से गरम दल क्रान्तिकारी के लेख छपते थे।1914 में अलहिलाल को प्रतिबंधन कर दिया गया। लेकिन मौलाना फिर से हिन्दू मुस्लिम एकता , भारतीय राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए एक और साप्ताहिक पत्रिका ‘अल बलाग़’ शुरु की।1916 में सरकार ने इस पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कलाम को कलकत्ता से निष्कासित कर रांची में नजरबंद कर दिया। इस नजरबंद से उन्हें 1920 के प्रथम विश्व युध्द के बाद रिहा कर दिया। जेल से रिहाई के बाद कलाम ने खिलाफत आंदोलन से मुसलमानों को जगाने का काम किया। बिट्रिश सरकार ने तुर्की पर कब्जा कर लिया था इसलिए खिलाफत आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य खलीफा को फिर से स्थपित करना हो गया था। इस आंदोलन में मुसलमानों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
आजाद के द्वारा खिलाफत आंदोलन में पूर्ण सहयोग के बाद गांधी के असहयोग आंदोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई।1920 में मौलाना ने काग्रेंस जॉईन की। दिल्ली में 1923 में मौलाना को काग्रेंस अध्यक्ष बनाया गया। मौलाना को नमक कानुन तोड़ने के कारण गांधी के साथ 1930 में फिर से गिरफ्तार कर लिया। कलाम इस आरोप में करीब डेढ़ साल मेरठ की जेल रखें गए। मौलाना आजाद को 1940 में रामगढ़ अधिवेशन में काग्रेंस अध्यक्ष बने और 1946 तक रहें।
कलाम को विभाजन से बहुत दुख हुआ और वो विभाजन के खिलाफ थे। उन्होनें तो ये भी कहा की एक संगठित राष्ट्र के सपने को पूरी तरह से खत्म कर दिया। मौलाना आजाद ने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे। वह 1947 से 1958 तक शिक्षा मंत्री रहे।आज के ही दिन 22 फरवरी 1958 को दिल का दौरा पड़ने के कारण मौलाना आजाद का इन्तकाल हो गया।खिराज ए अकिदत पेश करने वालों में राष्ट्रीय अध्यक्ष हयात ज़फर हाशमी के अलावा रईस अन्सारी राजू, युसुफ मन्सूरी, कुमैल अन्सारी,मोनिस, करीम, राशिद, जावेद, मोहम्मद नदीम सिद्दीकी, शहनवाज अन्सारी, मोहम्मद ईशान, मोहम्मद शारिक मंत्री, आदि लोग रहे।